Flex Fuel And Ethanol-Blended Fuel – भारत में वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है और इसके साथ प्रदूषण, ईंधन खर्च और कच्चे तेल पर निर्भरता भी बढ़ती जा रही है। इसी वजह से सरकार अब फ्लेक्स फ्यूल और ईथेनॉल-ब्लेंडेड फ्यूल को बढ़ावा दे रही है, ताकि पेट्रोल पर निर्भरता कम हो और प्रदूषण भी घटे।
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ऐसे में लोगों के मन में सवाल है कि ईथेनॉल, E85, E100 और गन्ने के रस का आपस में क्या कनेक्शन है।
क्या है ईथेनॉल?
ईथेनॉल एक तरह का बायोफ्यूल है, जिसे पेट्रोल के साथ मिलाकर वाहनों में इस्तेमाल किया जाता है। इसे फ्लेक्सिबल फ्यूल भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें पेट्रोल और ईथेनॉल का मिश्रण अलग-अलग अनुपात में हो सकता है। इसका केमिकल फॉर्मूला C2H5OH होता है।
भारत में पिछले कुछ समय से ईथेनॉल को लेकर काफी चर्चा हो रही है, क्योंकि इससे पेट्रोल पर निर्भरता कम करने की कोशिश की जा रही है। यही वजह है कि अब ईथेनॉल से चलने वाले वाहन भी धीरे-धीरे बाजार में आने लगे हैं।
E20, E85 और E100 का मतलब
ईंधन में लगे E का मतलब होता है ईथेनॉल की मात्रा।
- E20 में 20 प्रतिशत ईथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है।
- E85 में 85 प्रतिशत ईथेनॉल और 15 प्रतिशत पेट्रोल होता है।
- E100 में 100 प्रतिशत ईथेनॉल होता है।
यानी जैसे-जैसे E का नंबर बढ़ता है, वैसे-वैसे फ्यूल में ईथेनॉल की मात्रा बढ़ती जाती है और पेट्रोल की मात्रा घटती जाती है। सरकार का लक्ष्य यही है कि आने वाले समय में ज्यादा से ज्यादा वाहनों को साफ ईंधन पर चलाया जा सके।
गन्ने के रस से क्या संबंध है?
ईथेनॉल सिर्फ पेट्रोल मिलाकर ही नहीं, बल्कि गन्ने के रस और गन्ने से निकलने वाले उप-उत्पादों से भी बनाया जा सकता है। भारत जैसे देश में जहां गन्ने का उत्पादन बड़ी मात्रा में होता है, वहां ईथेनॉल उत्पादन के लिए यह एक बड़ा स्रोत बन जाता है।
यही कारण है कि सरकार गन्ना-आधारित ईथेनॉल को बढ़ावा दे रही है। इससे किसानों को भी फायदा होता है, क्योंकि गन्ने की मांग बढ़ती है और अतिरिक्त आय के नए रास्ते खुलते हैं।
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क्यों हो रही ब्लेंडिंग?
पेट्रोल में ईथेनॉल मिलाने की सबसे बड़ी वजह है कच्चे तेल के आयात पर खर्च कम करना। भारत हर साल बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम उत्पाद आयात करता है, जिस पर भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। अगर पेट्रोल की जगह ईथेनॉल का इस्तेमाल बढ़े, तो यह खर्च काफी हद तक घट सकता है।
दूसरा बड़ा कारण प्रदूषण है। ईथेनॉल, पेट्रोल की तुलना में कुछ हद तक साफ जलता है, जिससे वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिलती है। इस तरह सरकार ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण, दोनों मोर्चों पर फायदा देख रही है।
क्या माइलेज कम हो जाएगी?
यह सबसे बड़ा सवाल है और लोगों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा भी इसी पर है। सरकार की ओर से पहले कहा गया था कि E20 ईंधन वाले वाहनों में माइलेज 2 से 6 प्रतिशत तक कम हो सकती है। लेकिन कई उपयोगकर्ताओं का अनुभव इससे अलग है। कुछ लोगों का कहना है कि पुराने वाहनों में यह कमी ज्यादा महसूस हुई है और माइलेज में 30 प्रतिशत तक गिरावट आई है।
असल में, ईथेनॉल की ऊर्जा घनता पेट्रोल से कम होती है। इसलिए जब ईंधन में ईथेनॉल की मात्रा बढ़ती है, तो वाहन को उतनी ही दूरी तय करने के लिए थोड़ा ज्यादा फ्यूल चाहिए होता है। यही वजह है कि माइलेज पर असर पड़ सकता है।
क्या पुराने वाहनों में E85 चल सकता है?
जानकारों के मुताबिक, अगर आपकी गाड़ी पुरानी है और वह E20 compliant भी नहीं है, तो उसमें E85 डालना ठीक नहीं माना जाता। ऐसा करने से इंजन पर दबाव पड़ सकता है और तकनीकी समस्या आ सकती है।
E85 और E100 खास तौर पर ऐसे वाहनों के लिए बेहतर हैं, जिन्हें उसी हिसाब से डिजाइन या ट्यून किया गया हो। पुराने पेट्रोल वाहनों में बिना जांच के ऐसा फ्यूल डालना नुकसानदेह हो सकता है। इसलिए वाहन मालिकों को अपने मॉडल की फ्यूल कम्पैटिबिलिटी जरूर जांचनी चाहिए।
पानी की कितनी जरूरत पड़ती है?
ईथेनॉल को लेकर एक और अहम सवाल यह है कि इसे बनाने में कितनी पानी की खपत होती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक टन गन्ने से 100 किलोग्राम चीनी बनती है और इसी प्रक्रिया से करीब 70 लीटर ईथेनॉल भी तैयार किया जा सकता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, एक लीटर ईथेनॉल बनाने के लिए लगभग 3000 लीटर पानी की जरूरत पड़ सकती है। वहीं, मकई से बने ईथेनॉल के लिए करीब 2570 लीटर पानी लग सकता है। यही वजह है कि ईथेनॉल को लेकर पर्यावरणीय फायदे के साथ-साथ संसाधन खपत पर भी चर्चा होती रहती है।
क्या हैं कुल फायदे?
ईथेनॉल ब्लेंडिंग के कई फायदे बताए जाते हैं। इससे विदेशी तेल पर निर्भरता कम हो सकती है, किसानों को अतिरिक्त बाजार मिलता है, और प्रदूषण घटाने में मदद मिलती है। इसके साथ ही देश की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होती है।
हालांकि, इसके साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। पुराने वाहनों की अनुकूलता, माइलेज में संभावित कमी, और पानी की खपत जैसे मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी है। इसलिए ईथेनॉल को एक समाधान के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसे लागू करने के लिए संतुलन और सावधानी दोनों जरूरी हैं।
निष्कर्ष
ईथेनॉल, E85, E100 और गन्ने के रस का सीधा संबंध भारत की नई ईंधन नीति से है। जैसे-जैसे पेट्रोल में ईथेनॉल का मिश्रण बढ़ेगा, वैसे-वैसे कच्चे तेल पर निर्भरता घटेगी और साफ ईंधन का इस्तेमाल बढ़ेगा। लेकिन पुराने वाहनों, माइलेज और पानी की खपत जैसे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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