Why Did The RBI Revert To Plastic Notes – रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक बार फिर प्लास्टिक यानी पॉलिमर नोट लाने की तैयारी में दिख रहा है। शुरुआती चर्चा के मुताबिक, 10 और 20 रुपये के नोट सबसे पहले पॉलिमर में आ सकते हैं। इस दिशा में RBI की सहायक कंपनी BRBNMPL ने ट्रांसपैरेंट पॉलिमर सब्सट्रेट शीट की सप्लाई के लिए ग्लोबल एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट भी जारी किया है…
यह पहली बार नहीं है जब भारत में प्लास्टिक नोटों पर विचार हुआ है। पिछले 16 साल में यह तीसरी कोशिश बताई जा रही है। इससे पहले 2007-12 और 2016 में भी ऐसे नोट लाने की तैयारी हुई थी, लेकिन वह सफल नहीं हो सकी। अब सवाल यह है कि RBI फिर इस दिशा में क्यों लौट रहा है और क्या इस बार यह प्रयोग कामयाब होगा।
प्लास्टिक नोट, जिन्हें आधिकारिक रूप से पॉलीमर बैंकनोट कहा जाता है, पारंपरिक कॉटन-बेस्ड कागज से नहीं बल्कि BOPP यानी बायएक्सियली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन जैसी पतली और लचीली सिंथेटिक शीट से बनते हैं। ये नोट देखने में भले ही “प्लास्टिक” लगते हों, लेकिन कार्ड जैसे सख्त नहीं होते; इन्हें मोड़ा जा सकता है और ये जेब में सामान्य नोटों की तरह रखे जा सकते हैं।
कागजी नोटों की तुलना में पॉलिमर नोट की सबसे बड़ी खूबी उसकी टिकाऊपन है। कागजी नोट आमतौर पर कपास और लिनन के मिश्रण से बनते हैं, लेकिन वे नमी, गंदगी और बार-बार इस्तेमाल से जल्दी खराब हो जाते हैं। फटने, गंदे होने और बार-बार बदलने की जरूरत के कारण इन्हें छापने, ढोने और नष्ट करने पर बड़ा खर्च आता है।
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RBI के आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में करेंसी नोट छापने पर करीब 6,372 करोड़ रुपये खर्च किए। इस भारी खर्च को कम करना और नोटों की लाइफ बढ़ाना ही पॉलिमर नोटों के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क माना जा रहा है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, पॉलिमर नोट कागजी नोटों के मुकाबले 2 से 6 गुना तक ज्यादा चलते हैं।
दुनिया में भी कई देश पहले से पॉलिमर करेंसी इस्तेमाल कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया, रोमानिया और न्यूजीलैंड जैसे देश इस दिशा में काफी आगे हैं। भारत में यदि यह सिस्टम लागू होता है, तो नोट छापने, परिवहन, स्टोरेज और पुराने नोट नष्ट करने की लागत में कमी आ सकती है।
फेक करेंसी पर लगाम लगाने के लिहाज से भी पॉलिमर नोटों को बेहतर माना जाता है। इनकी सबसे खास पहचान Transparent Window होती है, जिसके अंदर होलोग्राम, Colour-Shifting Ink और अन्य Optically Variable Devices लगाए जा सकते हैं। इन सुरक्षा फीचर्स की नकल करना कागजी नोटों की तुलना में ज्यादा मुश्किल होता है। यही वजह है कि इसे नकली नोटों के खिलाफ मजबूत विकल्प माना जा रहा है।
लेकिन यह तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। पॉलिमर नोट छापना कागजी नोटों से शुरुआत में महंगा पड़ सकता है। इसके अलावा, इनकी चिकनी सतह के कारण कुछ जगहों पर इन्हें संभालना अलग अनुभव दे सकता है। रीसायकल करना भी कागजी नोटों की तुलना में अधिक महंगा होता है। अगर भारत में यह बदलाव बड़े पैमाने पर होता है, तो एटीएम, करेंसी काउंटिंग मशीन, बैंकिंग सिस्टम और नोट गिनने वाली मशीनों में भी बदलाव करने पड़ सकते हैं।
एक और चुनौती गर्मी से जुड़ी है। बहुत अधिक तापमान में पॉलिमर नोटों का आकार या गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है, इसलिए भारतीय मौसम और लॉजिस्टिक सिस्टम के हिसाब से इनकी टेस्टिंग बेहद जरूरी होगी। इसी कारण RBI शायद पहले छोटे नोटों पर पायलट प्रोजेक्ट के जरिए अनुभव लेना चाहता है।
तो क्या प्लास्टिक नोट आ जाएंगे? अभी इसका सीधा जवाब नहीं है। फिलहाल यह केवल एक प्रस्ताव और तैयारी का चरण है। लेकिन इतना साफ है कि RBI इस बार प्लास्टिक नोटों को सिर्फ “नया प्रयोग” नहीं, बल्कि नोटों की उम्र बढ़ाने, खर्च घटाने, नकली नोटों पर रोक लगाने और मुद्रा व्यवस्था को ज्यादा टिकाऊ बनाने के विकल्प के तौर पर देख रहा है।

